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मिर्जा गालिब-जीवन परिचय | Biography of Mirza Ghalib

जन्म -22 दिसम्बर 1796
जन्म स्थान  आगरा, उ०प्र०
पिता – मिर्जा अब्दुल्ला बेग खान
मृत्यु – 15 फरवरी 1869

दिल था की जो जाने दर्द तम्हीद सही
बेताबी-रश्क व हसरते-दीद सही
हम और फसुर्दन, ए तजल्ली ! अफ़सोस
तकरार रवा नहीम तो तजदीद सही

उर्दू एवं फारसी भाषा के महान शायर मिर्जा ग़ालिब का जन्म एक सौनिक परिवार में 27 दिसम्बर 1796 को आगरा में हुआ, इनका परिवार तुर्क पुष्ठभूमि से जुड़ाहुआ था, 1750 के आस-पास इनके दादा मध्य एशिया के समरकंद से भारत आये थे, जब ये भारत आये थे तो उस दौरान यहाँ का शासक अहमद शाह था ! ग़ालिब के बचपन में ही इनके पिता मिर्जा अब्दुल्ला बेग खान और कमाता इज्जत-उत –निसा  बेगम जा इंतकाल हो गया ! सिर पर से माता पिता का साया हठने चलाना पर इनका पालन-पोषण इनके दादा मिर्जा कोबान बेग खान ने ग़ालिब के  चाचा को मिलने वाले पेंशन के सहारे किया, ग़ालिब के चाचा अंग्रजी हुकुमत में सैन्य अधिकारी और इसी दौरान किसी कारण वश इनकी मृत्यु हो गयी थी ! ग़ालिब के पिता शुरुआत के दिनों में लखनऊ के नवाब के यहाँ पर कार्य किये और फिर हैदराबाद के निजाम के यहाँ पर काम किये, 1803 ई० में अलवर में एक युध्दके दौरान ग़ालिब के पिता कि मृत्यु हो गयी पिता कि मृत्यु के समय ग़ालिब कि उम्र महज पांच वर्ष थी ! ग़ालिब कि शिक्षा के संदर्भ में कोई भी स्पष्ट मत नहीं प्राप्त है लेकिन ग़ालिब के अनुसार उन्होंने 11 वर्ष कि अवस्था से ही उर्दू  एवं फारसी भाषा में कविताओं और शायरियों का लेखन आरम्भ कर दिया, इन्होनें उर्दू एवं फारसी भाषा में पारम्परिक भक्ति और सौदर्य रस से चरित पारम्परिक गीत काव्य की रहस्मय-रोमांटिक शैली में सबसे व्यापक रूप से लिखा !

ग़ालिब ने मुल्ला अब्दुसामाद से अरबी, फारसी, तर्क शाश्त्र एवं दर्शनशास्त्र में बहुत ही अच्छा ज्ञान अर्जित कर लिया, पढाई के दौरान ही ग़ालिब  ने सभी तरह के सबक को बहुत व्यापक एवं विस्तृत ढंग से सीखा और अपने बौध्दिक ज्ञान को बढ़ाया ! शेख इब्राहिम जोक के निधन के बाद, ग़ालिब को सम्राट बहादुर शाह जफर का, उनकी कविता पर परामर्श देने का विशेषधिकार प्राप्त हुआ, इसके साथ ही ग़ालिब को मुगल दरबार के इतिहासकार के रूप में नियुक्त किया गया ! ग़ालिब का विवाह 13 वर्ष की आयु में नवाब ईलाही बख्श की बेटी उमराव बेगम के साथ हो गया ! विवाह के बाद ये लखनऊ से दिल्ली आ गए और सारी उम्र यहीं पर रहें ! हालाकिं पेंशन के सिलसिले में इन्हें कभी-कभी कोलकाता जाना पड़ता था, अपनी कोलकाता यात्रा का वर्णन इनकी गजलों में जगह – जगह मिलते है, उर्दू के इस महान शायर का इंतकाल 15 जनवरी 1869 को दिल्ली में हो गया !

साहित्यिक परिचय

इनकी सर्वाधिक रचनायें उर्दू एवं फारसी भाषा में लिखी गयी है जो कि गजलों के रूप में हैं, हिन्दुस्तान में लोगों तक फारसी भाषा को पहुँचाने का श्रेय इन्हीं को जाता हैं, इनके द्वारा लिखे गये पत्रों को भी उर्दू भाषा का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता हैं, साहित्यिक भाषा शैली के रूप में इनकी रचनाओं में प्रेम का सर्वाधिक भाव मिलता हैं !

रचनायें

सम्मान

 

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